शुक्रवार, 14 मार्च 2014

सिसक रहे सपनों से आगे 

सिसक रहे 
सपनों से आगे 
कुछ तो जीवन-सत्य खड़े हैं 
उन्हें सहेजें,
उन्हें सजायें 
देखें नये-नये फिर सपने 

जब नवजात 
कोंपलों को भी
निष्ठुर मौसम
जला रहा है
जब एकाकीपन
जीवन का
सहयोगीपन
गला रहा है
तब अपने ही
आस-पास में
खोजें कौन पराये-अपने

लगे सांत्वना भी
गाली सी ,
जब नैराश्य
प्रबल होता है
अपना धैर्य
बचाकर रखना
शक्ति औ'
सम्बल होता है
अपने साहस
आँच-ताप में
आयें तब कुंदन सा तपने

कितनी भी
वीभत्स प्रलय हो
सब कुछ नष्ट
नहीं होता है
बची ऊर्जा के
संचय में
कोई कष्ट
नहीं होता है
अपने साम
गान में खोजें
मंत्र सृजन के फिर से जपने

-जगदीश पंकज

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें