मंगलवार, 11 मार्च 2014


गीत है वह

गीत है वह
जो सदा आखें उठाकर
है जहाँ पर भी
समय से जूझता है

अर्ध्य सत्यों के
निकल कर दायरों से
जिन्दगी की जो
व्यथा को छू रहा है
पद्य की जिस खुरदरी ,
झुलसी त्वचा से
त्रासदी का रस
निचुड़ कर चू रहा है
गीत है वह
जो कड़ी अनुभूतियों की
आँच  से अनबुझ
पहेली बूझता है

कसमसाती
चेतना की, वेदना का
प्रस्फुटन
जिसमैं गढ़ा है
गीत है वह
जो सदा उद्दाम लहरों सी
निरंतरता लिये
आगे बढ़ा है
गीत है वह
जो सहारा बन उभरता
जिस समय कोई न
अपना सूझता है

-जगदीश पंकज 

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